कर्म दग्धबीज से क्या अभिप्राय है?
तत्र ध्यानजमनाशयम्।। योग०4.6।। महर्षि पतंजलि कहते हैं कि जो ध्यान योग से सिद्ध चित् है, वह यथार्थ ज्ञान से अनाशयम्- कर्मवासना और क्लेशवासना से रहित होता है। अर्थात् कर्मों से बंधा हुआ नहीं होता है। क्योंकि इस प्रकार की आत्मा के कर्म दग्धबीज अर्थात् जले हुए बीजों के समान होने से फिर फलाभिमुख नहीं होते हैं। और जब योग के बल से सभी कर्मों के फलों का नाश हो जाता है, तब वह जीव मोक्ष की स्थिति में पहुंचता है।