यथार्थ ज्ञान से कर्मबंधन का विनाश

 सम्यग् दर्शन सम्पन्नः , कर्मभिर्न निबध्दयते ।

दर्शनेन   विहीनस्तु,   संसारं  प्रतिद्यते।। मनुस्मृति 6:51।।

जिसने भली भांति परमात्मा का अनुभव व साक्षात्कार कर लिया है वह सांसारिक कर्मों के बंधन में नहीं बंधता अर्थात कर्म बंधन से मुक्त होकर जन्म-मरण के चक्र से छूट कर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। किंतु जो परमात्मा के अनुभव और दर्शन से रहित है ,वह संसार में जन्म ग्रहण करता रहता है अर्थात् जन्म- मरण और दुखों को झेलता रहता है।


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